“मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूँ, ताकि जब मैं आपसे स्वर्ग में मिलूँ, तो आपको पहचान सकूँ और एक बार फिर आपका धन्यवाद कर सकूँ।”
भारत के रत्न, रतन टाटा जी को कौन नहीं जानता। आज वे हमारे बीच नहीं हैं — अक्टूबर 2024 में उनका निधन हुआ — लेकिन उनके सामाजिक कार्यों की चर्चा आज भी हर जगह होती है। इस धरती पर प्रतिदिन न जाने कितने लोगों का स्वर्गवास होता है, पर क्या हर किसी को इस तरह याद किया जाता है, जैसे रतन टाटा सर को किया जाता है?
ऐसा क्यों? उनमें ऐसी क्या बात थी जो उन्हें बाकियों से अलग करती थी?
वह बात थी — लोगों की मदद करना। ज़रूरतमंदों की मदद, असहायों का सहारा बनना, दुखियों के सुख का कारण बनना। कोई यूँ ही महान नहीं बन जाता — महान बनने के लिए महान कार्य करने पड़ते हैं, लालच और मोह-माया त्यागनी पड़ती है। रतन टाटा जी में ये सब गुण थे।
धन तो बहुतों ने कमाया, पर क्या किसी ने cancer hospital बनवाए? Animal hospital बनवाए? ऐसे कई सामाजिक कार्य रतन टाटा सर ने किए, जिस कारण आज हर कोई उन्हें याद करता है। उन्हीं से जुड़ी एक कहानी आज साझा कर रहा हूँ।
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एक बार interview में किसी ने रतन टाटा जी से पूछा — “सर, आपको याद है कि जीवन में सबसे ज़्यादा खुशी आपको कब मिली?”
उन्होंने कहा — “मैं जीवन में खुशी के चार चरणों से गुज़रा हूँ, और आखिरकार मुझे सच्चे सुख का अर्थ समझ आया।”
पहला चरण — धन और साधन इकट्ठा करना। लेकिन इस स्तर पर मुझे वह सुख नहीं मिला जो मैं चाहता था।
दूसरा चरण — कीमती चीज़ों को इकट्ठा करना। लेकिन मैंने महसूस किया कि इसका असर अस्थायी होता है — कीमती चीज़ों की चमक ज़्यादा देर नहीं रहती।
तीसरा चरण — बड़े projects मिलना। मैं भारत और एशिया के सबसे बड़े steel कारखानों का मालिक बना। लेकिन यहाँ भी मुझे वह खुशी नहीं मिली जिसकी मैंने कल्पना की थी।
चौथा चरण — वह समय जब मेरे एक मित्र ने मुझसे कुछ विकलांग बच्चों के लिए wheelchair खरीदने में मदद माँगी। लगभग 200 बच्चे थे। दोस्त के कहने पर मैंने तुरंत wheelchair और ज़रूरत की चीज़ें खरीद लीं। लेकिन दोस्त ने ज़िद की कि मैं उसके साथ चलूँ और बच्चों को खुद wheelchair सौंपूँ। मैं तैयार होकर उसके साथ चल दिया।
वहाँ मैंने अपने हाथों से उन बच्चों को wheelchair दीं। मैंने उनके चेहरों पर खुशी की अजीब सी चमक देखी। मैंने उन्हें wheelchair पर बैठे, घूमते और मस्ती करते देखा — ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी picnic spot पर पहुँच गए हों। मुझे अपने अंदर असली खुशी महसूस हुई।
जब मैं वहाँ से जाने लगा, तो उन बच्चों में से एक ने मेरी टाँग पकड़ ली। मैंने धीरे से पैर छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे ने मेरा चेहरा देखा और पैरों को कसकर पकड़ लिया। मैं झुक गया और पूछा — “क्या तुम्हें कुछ और चाहिए?”
बच्चे ने जो जवाब दिया, उसने न सिर्फ मुझे झकझोर दिया, बल्कि जीवन के प्रति मेरे नज़रिए को ही बदल दिया। बच्चे ने कहा —
“मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूँ, ताकि जब मैं आपसे स्वर्ग में मिलूँ, तो आपको पहचान सकूँ और एक बार फिर आपका धन्यवाद कर सकूँ।”
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इस कहानी का सार यही है — हम सभी को अपने अंतर्मन में झाँककर यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि इस जीवन और सारी सांसारिक गतिविधियों के बाद हमें किस लिए याद किया जाएगा?
क्या कोई आपका चेहरा फिर से देखना चाहेगा?